कोरोना की मार, श्रद्धालु नहीं पहुंच पाए कमरुनाग

कमरुनाग काे जाने वाले रास्ते चौकी,रोहांडा,करसोग, गोहर के रास्ते में लगे थे पुलिस के नाके

कमरूनाग की ओर जाने वाले श्रद्धालुओं की गाडि़यों को हटाया वापिस

जया शर्मा .मंडी

राजधानी मंडी के कमरुनाग की झील में इस बार श्रद्धालु अपनी मन्नत का चढ़ावा झील के अंदर नहीं चढ़ा पाए। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि कोरोना महामारी का संक्रमण ना फैले, इस बार यहां पर मेला नहीं मनाया गया। यह मेला ज्येष्ठ मास की संक्राति के दिन मनाया जाता है। अधिष्ठाता देव कमरूनाग का यह मेला दो दिन तक मनाया जाता था। यानी 14 व 15 जून को मनाया जाता था।  इस बार सिर्फ मंदिर प्रंबधन द्वारा यहां संक्राति पर विशेष पूजा पाठ कमरुनाग का किया गया। इसके अलावा कमरुनाग मंदिर को जाने वाले रास्ते, चौकी, रोहांडा, करसोग, गोहर के हर तरफ के रास्ते में पुलिस के नाके थे। चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात थी ताकि लोग चुपचाप मंदिर तक ना पहुंच पाए। प्रशासन व मंदिर कमेटी की ओर से कोरोना महामारी के चलते इस बार मेला नहीं मनाने का निर्णय लिया गया था।

बता दें कि कमरूनाग महाभारत कालीन एक योद्धा रतन यक्ष था। भगवान कृष्ण ने छल के साथ उसका शीश उससे दान में लिया। यक्ष ने कटे शीश के द्वारा महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की थी। युद्ध के उपरांत कृष्ण ने उस शीश को पांडवों को दे दिया और उसे उनका ठाकुर घोषित किया। पांडव उस शीश को डंडे पर लटकाकर मंडी जिला के रोहांडा स्थित वर्तमान कमरूधार की ओर पहुंचे। मंडी-करसोग मार्ग पर रोहांडा बस ठहराव से छह किलोमीटर ऊपर नौ हजार फुट की उंचाई पर स्थित झील का एकांत स्थल ठाकुरों को पसंद आया। पांडवों ने यहां पर उसकी स्थापना देव रूप में कर दी व एक मंदिर व मूर्ति भी वहां बना दी। तोष के घने जंगल से घिरी यह झील कमरूनाग के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

झील में डालते हैं आभूषण और पैसे

गौर रहे कि यहां आने वाले श्रद्धालु की मुरादें पूरी होने के बाद लोग पवित्र झील में आभूषण और रुपये डालते हैं। यह झील देव कोष है जिसमें सोना-चांदी भरा पड़ा है। जब क्षेत्र में बारिश नहीं होती तो लोग इस देवता की शरण में जाते है। कमरुनाग देओ को बड़ा देओ के नाम से भी जाना जाता हैं।

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